चुनाव जीतने के लिए बड़ी रैलियां करना, सरकार के खिलाफ माहौल बनाना और लोकतंत्र बचाने के नारे लगाना काफी नहीं है। बात कड़वी लग सकती है लेकिन इसके मायने समझने जरूरी हैं। बात अब यहां से शुरु होती है कि अगर रैलियों से चुनाव नहीं जीते जाएंगे तो फिर क्या करें? इस सावल का जवाब है, जनता का भरोसा और उस भरोसे पर फतेह। जनता का भरोसा जीतने के लिए राजनीतिक दलों को उसके रोजमर्रा के मुद्दों से जुड़ना पड़ेगा। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष की ‘वोट चोरी’ मुहिम के सामने भी यही चुनौती है। आंदोलन के जरिए सरकार को घेरना और चुनाव जीतना, दोनों अलग-अलग रणनीतियां हैं।

रामलीला मैदान में विपक्ष की बड़ी रैली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की पहल 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण की रैली की याद दिलाती है। उस समय जेपी ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जनआंदोलन का आह्वान किया था। आज विपक्ष भी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर जनता को एकजुट कर रहा है। लेकिन विपक्ष को आंदोलन और चुनावी तैयारी के बीच संतुलन बनाना होगा।
विरोध की राजनीति से कमजोर हो सकता है संगठन
अलग-अलग विचारधारा वाले दल केवल सरकार के विरोध में साथ आते हैं तो उनकी अपनी पहचान और राजनीतिक एजेंडा कमजोर पड़ सकता है। फैसले भी कुछ बड़े नेताओं तक सीमित रह सकते हैं।
पश्चिम बंगाल में टीएमसी की कमजोरी के पीछे सत्ता और संसाधनों पर निर्भर संगठन भी एक वजह है। ममता बनर्जी को केवल ‘वोट चोरी’ के बजाय कार्यकर्ताओं और मुस्लिम-दलित समुदायों से दोबारा जुड़ना होगा। कांग्रेस भी टीएमसी से गठबंधन के चक्कर में अपना संगठन बढ़ाने का मौका गंवा सकती है।
बिहार चुनाव से मिली सीख
कांग्रेस ने बिहार में 20 जिलों में दो हफ्ते तक 1,300 किलोमीटर की वोटर अधिकार यात्रा निकाली और पटना के गांधी मैदान में बड़ी रैली की। भीड़ जुटने के बावजूद 61 में से सिर्फ 6 सीटें मिलीं। रोजगार, जाति, कल्याणकारी योजनाएं और सार्वजनिक सेवाएं मतदाताओं के लिए ज्यादा अहम रहीं।
तेलंगाना ने दिखाई संगठन की ताकत
तेलंगाना में कांग्रेस ने दलित-आदिवासी आंदोलनों और राज्य आंदोलन के पुराने कार्यकर्ताओं से नेटवर्क बनाया। भारत जोड़ो यात्रा ने इसे गति दी। राजनीतिक और कारोबारी वर्ग भी पार्टी से जुड़ा और कांग्रेस सत्ता में लौटी।
जनता के बीच मजबूत विकल्प बने विपक्ष
चुनाव सुधार की मांग जरूरी है, लेकिन सरकार की नीतियों पर जनता के बीच काम करना भी उतना ही अहम है। केवल रैलियों और विरोध से स्थायी जनाधार नहीं बनता। विपक्ष को मजबूत संगठन, सामाजिक जुड़ाव और ठोस राजनीतिक एजेंडे के साथ खुद को सरकार के विकल्प के रूप में तैयार करना होगा।










