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  • अमेरिका को अमेरिका किसने बनाया?

    दोस्तों, कभी सोचा है कि अमेरिका को विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और स्ट्रैटेजिक महाशक्ति किसने बनाया? इस बारे में हिस्ट्री चैनल की एक दिलचस्प सीरीज़ है, ‘The Men Who Built America’। इसमें दिखाया गया है कि आज के अमेरिका की मज़बूत नींव किसी राजनेता, वैज्ञानिक या बुद्धिजीवी ने नहीं, बल्कि 5 साहसी और जुनूनी


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    दोस्तों, कभी सोचा है कि अमेरिका को विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और स्ट्रैटेजिक महाशक्ति किसने बनाया? इस बारे में हिस्ट्री चैनल की एक दिलचस्प सीरीज़ है, ‘The Men Who Built America’। इसमें दिखाया गया है कि आज के अमेरिका की मज़बूत नींव किसी राजनेता, वैज्ञानिक या बुद्धिजीवी ने नहीं, बल्कि 5 साहसी और जुनूनी उद्यमियों ने रखी थी।

    उस सीरीज़ ने 19वीं सदी के हज़ारों अग्रणी उद्यमियों में से सिर्फ पाँच को अमेरिका बनाने का श्रेय दिया, जो हैं: Cornelius Vanderbilt, Andrew Carnegie, John D. Rockefeller, J.P. Morgan और Henry Ford। इन पाँचों ने अमेरिका के मूलभूत और केंद्रीय उद्योगों की नींव रखी, जिनमें शामिल हैं इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्टील, तेल, बैंकिंग और ऑटोमोबाइल।

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    इन पाँचों दिग्गजों में एक बहुत खास बात थी… इनकी सोच सिर्फ अपनी दौलत बढ़ाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इनका विज़न अपने देश को शिखर पर ले जाने का था। आज हम जिसे Philanthropy यानी ‘परोपकार’ कहते हैं, उसकी शुरुआत सही मायने में इन्हीं लोगों ने की थी और इनमें से अधिकांश ने अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा जीते जी ही समाज को लौटा दिया।

    अमेरिका की सफलता का एक बड़ा राज़ वहां का वर्ल्ड-क्लास यूनिवर्सिटी सिस्टम है, जो दुनिया में नई सोच और आविष्कारों का केंद्र है। कमाल की बात ये है कि वहां की टॉप-40 यूनिवर्सिटीज़ में से लगभग सभी इन्हीं उद्यमियों के दान से बनी हैं। यही नहीं, वहां के बेहतरीन अस्पताल, लाइब्रेरीज़ और थिंक-टैंक भी इन्हीं की बदौलत खड़े हुए हैं। और यह सब सिर्फ़ इन पाँच तक सीमित नहीं, ऐसे हज़ारों उद्यमी रहे हैं जिन्होंने समय-समय पर अपनी दौलत समाज को लौटाई।

    इन सभी उद्यमियों ने अपने बच्चों के प्रति भी अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई, उनके जुनून को सहारा देकर। अगली पीढ़ियों ने अपनी रुचि और जुनून को आगे बढ़ाया। कुछ बिज़नेस में रहे, तो कुछ अपनी पसंद के दूसरे कामों में लग गए। नतीजा यह हुआ कि ये कंपनियां प्रोफेशनल्स के हाथों में चली गईं और आज भी अपने प्रोफेशनल मैनेजमेंट के साथ दुनिया भर में अपना लोहा मनवा रही हैं। उन्होंने अपने बिज़नेस को ‘देश की अमानत’ माना, न कि सिर्फ ‘पारिवारिक संपत्ति’। असल में उन्हीं उद्यमियों की वजह से आज भी अमेरिकी पूंजीवाद (Capitalism) इतना जीवंत है और उसे वहां के समाज में इतनी बड़ी स्वीकृति मिली है।

    मेरा हमेशा से मानना है कि भारत और अमेरिका कई मायनों में एक जैसे हैं। अमेरिका की तरह भारत भी एक विशाल देश है। हम प्राकृतिक व मानव संसाधनों से भरपूर हैं। उद्यमिता हमारी परम्पराओं में है, और हमारे देश की महिलाओं में तो अपार शक्ति और संभावनाएं हैं। मेरा अटूट विश्वास है कि वो दिन दूर नहीं, जब भारत दुनिया का नंबर-1 देश बनेगा और अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा।

    पर सवाल ये है कि उस भारत को बनाएगा कौन? और जवाब एकदम साफ है, हमारे उद्यमी! हमें अपने उद्यमियों का हौसला बढ़ाना होगा, उन पर भरोसा करना होगा, उन्हें पूरा सम्मान और काम करने की आज़ादी देनी होगी। उन्हें मुश्किल प्रक्रियाओं में न उलझाएं, Self-certification की सुविधा दें और उन्हें अपनी पूरी ऊर्जा अपने व्यवसाय को बढ़ाने में लगाने दें। फिर वही लोग संपत्तियां खड़ी करेंगे, संसाधनों का सही उपयोग करेंगे, बड़ी संख्या में नौकरियां पैदा करेंगे, राजस्व में योगदान देंगे और भारत के उदय को नई रफ्तार देंगे।

    मुझे पूरा भरोसा है कि जब देश और देशवासियों के प्रति समर्पित उद्यमियों को सरकार का सहयोग और समाज का सम्मान मिलेगा, तो भारत को दुनिया का नंबर-1 देश बनने से कोई नहीं रोक सकता। और अगर यह मोदी सरकार के कार्यकाल में नहीं होगा, जिसे दुनिया उसकी गतिशीलता के लिए पहचानती है, तो फिर कब होगा?

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