भाजपा सरकार में लूट सके तो लूट लो
बिहार में भाजपा की सरकार है, यहां भ्रष्टाचार की गंगोत्री खुल कर बह रही है। चाहे कोई भी क्षेत्र हो सिर्फ लूट ही लूट मची है, कोई रोकने वाला नहीं है। सरकार, उसके सरकारी तंत्र सहित सभी मिल कर जनता के द्वारा दिए गये टैक्स के पैसों से सरकारी खजाने से लूट हो रही है। बिहार सरकार के उद्योग विभाग में एमओयू के नाम पर 1 लाख की कंपनी हजार करोड़ का काम करेंगी ?
बिहार सरकार द्वारा हाल ही में आयोजित निवेश कार्यक्रमों (एमओयू) के बाद सोशल मीडिया और कुछ स्थानीय डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर यह दावा तेजी से वायरल हो रहा है। इस दावे के केंद्र में सरकार द्वारा किए गए 51,600 करोड़ के औद्योगिक समझौतों की प्रामाणिकता पर उठाए गए सवाल हैं। इस पूरे मामले की मुख्य बातें और इसके पीछे का सच इस प्रकार है दावे की मुख्य बातें आरोप- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे टाईम्स आफ स्वराज और दी इंडिया टाॅप ) पर रिपोर्ट दिखाई गई है कि जिन कंपनियों की श्पेड़-अप कैपिटल या अधिकृत पूंजी महज 1 लाख है, वे बिहार में हजारों करोड़ रुपये के निवेश (जैसे परमाणु ऊर्जा या फार्मा सेक्टर) के समझौते कर रही हैं। आशंका आलोचकों और स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा सवाल उठाया जा रहा है कि इतनी छोटी और कागजी कंपनियां इतने बड़े निवेश जमीन पर कैसे उतारेंगी और क्या यह सिर्फ सरकारी प्रचार या जमीन आवंटन और सब्सिडी से जुड़ा कोई खेल है? जमीनी हकीकत और नियम (तकनीकी पक्ष) व्यापार और उद्योग जगत के नियमों के अनुसार, किसी कंपनी की 1 लाख की शुरुआती पूंजी होने का मतलब यह नहीं होता कि वह बड़ा काम नहीं कर सकती। इसके पीछे निम्नलिखित तकनीकी कारण होते हैं बड़े उद्योगपति या कॉर्पोरेट घराने किसी खास राज्य या प्रोजेक्ट के लिए एक नई श्शेलश् या सहयोगी कंपनी एसपीभी बनाते हैं, जिसकी शुरुआती पूंजी कम रखी जाती है। बाद में मुख्य पैरेंट कंपनी या विदेशी निवेशकों द्वारा इसमें फंड डाला जाता है। एमओय केवल एक सहमति पत्र है-सरकार और कंपनियों के बीच होने वाला समझौता एमओयू शुरुआती इच्छा पत्र होता है, कोई अंतिम टेंडर या सरकारी खजाने से पैसा देना नहीं। जमीन और सब्सिडी के कड़े नियम- बिहार की औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति के तहत किसी भी कंपनी को वित्तीय मदद, टैक्स छूट या रियायती जमीन तभी मिलती है जब वे जमीन पर काम शुरू करती हैं और निवेश का भौतिक सत्यापन होता है। केवल कागजी कंपनी होने पर सरकार सीधे तौर पर करोड़ों रुपये नहीं सौंपती। निष्कर्ष यह मामला मुख्य रूप से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और खोजी पत्रकारिता का हिस्सा है, जहां विपक्ष और आलोचक कागजी आंकड़ों को आधार बनाकर सरकार की निवेश नीतियों पर संदेह जता रहे हैं। वहीं सरकारी पक्ष का मानना है कि श्बिहार बिजनेस कनेक्टश् और औद्योगिक नीतियों के जरिए राज्य में बड़े स्तर पर निवेश लाने का प्रयास किया जा रहा है। फिलहाल किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष वित्तीय श्घोटालेश् या श्लूटश् की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, क्योंकि ये निवेश अभी शुरुआती प्रक्रिया एमओयू के चरण में हैं।









