मध्य पूर्व में इस साल फरवरी के आखिर से जारी जंग के खत्म होने की उम्मीदें आखिर अब पूरी होती दिख रही है। ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते से भारत को कितने फायदे होंगे?
पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान ने घोषणा की है कि दोनों देश जंग खत्म करने को लेकर एक समझौते पर पहुंच गए हैं। 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में इस समझौते पर हस्ताक्षर होने हैं।
इस समझौते की सटीक रूपरेखा अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि ईरान के सरकारी मीडिया का कहना है कि इस समझौते की शर्तों में प्रतिबंधों को खत्म करना, ईरान का परमाणु प्रतिबंधों को न बनाने का वादा करना और 30 दिनों के अंदर होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलना शामिल है।
ईरानी उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा है कि 60 दिनों के बाद एक अंतिम समझौते पर बातचीत होगी जहां ईरान कई मुद्दों को देखा जाना है।
लेबनान के मुद्दे पर, मध्यस्थ पाकिस्तान का कहना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ने सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने की घोषणा की है।
वहीं लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन ने कहा कि उनके देश के लोग ऐसे व्यावहारिक कदमों की उम्मीद कर रहे हैं जो हिंसा के इस चक्र को हमेशा के लिए समाप्त कर दें। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि रूपरेखा की इस शर्त का इसराइल और ईरान समर्थित सशस्त्र राजनीतिक संगठन हिज्बुल्लाह पालन करेंगे या नही।
पीएम मोदी ने किया स्वागत
अमेरिका और ईरान के बीच समझौते पर सहमति बनने पर दुनियाभर से प्रतिक्रियाएं आई है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली के नेताओं ने एक संयुक्त बयान में कहा है कि वे अमेरिका, ईरान और क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर इस मौके का सदुपयोग करने के लिए काम करेंगें।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि जब 19 जून को समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे तब तेल की आवाजाही फिर से निर्बाध रूप से शुरू हो जाएगी। इस समझौते के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक्स पर लिखा, लंबी बातचीत के बाद, हमें यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है। दोनों पक्षों ने लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई को तुरंत और स्थायी रूप से रोकने की घोषणा की है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस घोषणा पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने एक्स पर लिखा, मैं पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त करने को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच बनी सहमति का स्वागत करता हूं। इस संघर्ष के कारण दुनियाभर में गंभीर आर्थिक अड़चन पैदा हुई और कई देशों में लोगों की जान गई।
पीएम मोदी ने कहा, भारत को उम्मीद है कि इस सहमति के लागू होने से क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाल करने में मदद मिलेगी और नेविगेशन और व्यापार की आजादी सुनिश्चित होगी। इसके अलावा उन्होंने उम्मीद जताई कि बाकी बचे मुद्दों पर भी होने वाली बातचीत एक टिकाऊ और अंतिम समझौते तक पहुंचेगें।
भारत को क्या होगा हासिल?
मध्य पूर्व में जंग की वजह से दुनियाभर में तेल और गैस के दामों और सप्लाई पर गंभीर असर पड़ा है जिससे भारत भी अछूता नहीं रहाहै। भारत की तेल और गैस सप्लाई प्रभावित होने के साथ-साथ उसके दामों में भारी उछाल देखा गया है। भारत की घरेलू खपत का तेल और गैस का 90 फीसदी हिस्सा आयात होता है, जिसमें कच्चे तेल आयात का 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। इनमें इराक, सऊदी अरब, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
इनमें से भी आधा तेल होर्मुज स्ट्रेट से आता है। जबकि मौजूदा संघर्ष के कारण होर्मुज में जहाजों की आवाजाही खासी बाधित हुई है। इस वजह से भी भारत पर इस जंग को लेकर खासा दबाव है।
ये समझौता लागू हो जाता है तो तेल की कीमतों में गिरावट आना तय है, लेकिन भारत को और क्या-क्या फायदा होंगे? इस सवाल पर ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि पूरा खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए तीन वजहों से अहमियत रखता है।
वो कहते हैं, हम भारी मात्रा में वहां से तेल और गैस खरीदते है। ये इलाका हमारे देश के नजदीक है जिसकी वजह से शिपिंग टाइम बहुत कम लगता है। पांच-छह दिन के अंदर समुद्री जहाज यहां पहुंच जाता है। उससे उसकी लागत भी कम आती है। बीमा वगैरह की जो लागत है वो भी कम हो जाती है।
दूसरी वजह यह है कि हमारे लगभग एक करोड़ भारतीय उस इलाके के अंदर काम करते हैं। इनमें हमारे मजदूर और स्किल्ड वर्कर्स शामिल हैं। तीसरी वजह इसका भारत के बिलकुल नजदीक होना और पाकिस्तान-चीन का वहां बढ़ता दबदबा है. भारत ऐसे हालात वहां नहीं चाहता जिससे कि वहां चीन का या पाकिस्तान का दखल बढ़ जाए। नरेंद्र तनेजा मानते हैं कि इस समझौते के लागू होने के बाद संघर्ष बंद हो जाएगा लेकिन शांति आएगी या नहीं, यह कहना जल्दबाजी होगी।
वहीं मिडिल ईस्ट इनसाइट्स प्लेटफॉर्म की फाउंडर डॉ. शुभदा चैधरी मानती हैं कि 19 जून को भी इस समझौते के लागू होने की उम्मीद बेहद कम है।
वो कहती हैं, मैं नहीं मानती कि ये डील होगी, इसके बहुत सारे कारण है। पहला यह कि अमेरिका का कहना है कि वो ईरान के जब्त किए गए 300 अरब डॉलर को वापस दे देंगे, लेकिन यह कैसे होगा? दूसरा, यमन और लेबनान के ऊपर बात नहीं हुई है। इजराइल का हमला कितने लेवल तक कम होगा? इसके बारे में कोई बात नहीं हुई है।
तीसरी चीज यह है कि अगर यह डील हो भी गई तो यह साफ नहीं है कि इस पर कौन हस्ताक्षर करेगा क्योंकि सुप्रीम लीडर मोजतबा खेमेनेई के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। ईरान के सुप्रीम काउंसिल, नेशनल काउंसिल और आईआरजीसी की अब क्या भूमिका है, ये साफ नहीं है।
शुभदा चैधरी कहती हैं कि ये सिर्फ तीन देशों के बीच की लड़ाई नहीं बल्कि दो ग्लोबल ऑर्डर की लड़ाई है। वो कहती हैं, एक ग्लोबल ऑर्डर इजराइल, ब्रिटेन, अमेरिका और बहुत से पश्चिम यूरोप देशों का है। वहीं दूसरी तरफ इसमें उत्तर कोरिया, चीन, रूस और ईरान शामिल है। ये पेट्रोडॉलर और पेट्रोयुआन की लड़ाई है। हालांकि शुभदा कहती हैं कि अगर समझौता हुआ तो भारत को चार चीजों में फायदा होगा।
वो कहती हैं, पहला फायदा ईरानी तेल को लेकर होगा जो यूएई या सऊदी तेल से बेहतर है क्योंकि उसमें सल्फर की मात्रा कम रहती हैं। दूसरा फायदा फर्टिलाइजर्स और गैस को लेकर होगा क्योंकि हम अधिकतर गैस और फर्टिलाइजर्स वहीं से खरीदते है। तीसरा रेमिटेंस का फायदा होगा क्योंकि भारी तादाद में भारतीय वहां काम करते है। चैथा फायदा भारतीयों की सुरक्षा और कच्चे तेल के दाम घटने का होगा।
ईरान में भारतीय योजनाओं का क्या होगा?
दुनिया के कुल तेल का तकरीबन 20 फीसदी हिस्से का परिवहन होर्मुज स्ट्रेट से होता है। नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि यह साफ नहीं है कि होर्मुज स्ट्रेट किसका नियंत्रण होगा, इस पर टोल लगेगा या नहीं। वो कहते हैं कि अगर होर्मुज स्ट्रेट पर टोल लगता है तो ये भारत समेत चीन और जापान जैसे देशों के लिए एक मुश्किल खड़ी हो जाएगी। हालांकि नरेंद्र तनेजा ये भी कहते हैं कि समझौता लागू होने से जो जहाज होर्मुज स्ट्रेट में फंसे हुए हैं जिसमें तमाम भारतीय नाविक हैं वो सुरक्षित रहेंगे और जो एक करोड़ भारतीय वहां रहते हैं उससे उन्हें स्थायित्व मिलेगा। जंग रुक जाती है तो तेल सस्ता होगा जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए तो बहुत अच्छी खबर है। और जो वहां से रेमिटेंस आते हैं और सारा सिलसिला दोबारा नॉर्मल हो जाएगा।
नरेंद्र तनेजा इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी उठाते हैं। वो कहते हैं कि क्या भविष्य में भारत तेल और गैस के लिए अपनी निर्भरता खाड़ी के देशों पर इतनी ही रखेगा या उसे कम करेगा।
साथ ही वो मानते हैं कि इस समझौते के लागू होने के बाद उस क्षेत्र में ईरान का दबदबा बढ़ेगा और उसके प्रतिद्वंद्वी सऊदी अरब की अमेरिका के अलावा और देशों पर बढ़ेगी।
भारत ने ईरान के चाबहार और बंदर अब्बास बंदरगाह में अच्छा निवेश किया था, लेकिन इस जंग के बाद भारत की इन योजनाओं पर विराम लग गया। शुभदा चैधरी कहती हैं कि ईरान भारत के लिए इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कोरिडोर (आईएनएसटीसी) की वजह से काफी अहम रहा है, साथ ही चाबहार में 20 साल के लिए निवेश किया गया है, इन सभी का भारत को फायदा मिलेगा।









