मध्य प्रदेश के आदिवासी भाई-बहन जल सत्याग्रह और भूख हड़ताल पर इसलिए बैठे थे क्योंकि केन-बेतवा परियोजना में उनकी ज़मीन छीन ली गई, लेकिन उन्हें न न्यायपूर्ण मुआवज़ा मिला और न सम्मानजनक पुनर्वास।
“सत्य” यह है कि आदिवासी देश के पहले मालिक हैं – जल, जंगल और ज़मीन पर सबसे पहला हक़ उन्हीं का है।
और उनका “सत्याग्रह” इसलिए है क्योंकि वही हक़ आज उनसे छीना जा रहा है।
अपने अनोखे तरीके से उनकी मांग बस इतनी है कि गुज़र-बसर करने के लिए उचित सहारा तो दो – वरना जिंदगी तो चिता के ही समान है।
मगर यह भी भाजपा सरकार को मंज़ूर नहीं। उनकी बात सुनने के बजाय पुलिस बल से उनका शांतिपूर्ण विरोध भी कुचला जा रहा है।
हम अपने आदिवासी भाई-बहनों के साथ हैं। उन्हें न्याय दिला कर रहेंगे – मुआवज़ा और पुनर्वास तो देना ही पड़ेगा।









